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Tuesday, 6 August 2013

राजस्थानी साहित्य / Literature of Rajasthan





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राजस्थानी साहित्य से संबंधित प्रमुख साहित्यकार / Important Writers Related to Literature of Rajasthan

सूर्यमल्ल मिश्रण: बूंदी जिले के हरणा गांव में चारण कुल में जन्मे सूर्यमल मिश्रण बूंदी के शासक महाराव रामसिंह हाड़ा के दरबारी कवि थे। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना वंश भास्कर है। जिसमें बूंदी के चौहान शासकों का इतिहास है। इनके द्वारा रचित अन्य ग्रंथ वीर सतसई, बलवंत विलास व छंद मयूख है। वीर रस के इस कवि को रसावतार कहा जाता है। सूर्यमल मिश्रण को आधुनिक राजस्थानी काव्य के नवजागरण का पुरोधा कवि माना जाता है। ये अपने अपूर्व ग्रंथ वीर सतसई के प्रथम दोहे में ही समय पल्टी सीस की उद्घोषणा के साथ ही अंग्रेजी दासता के विरूद्ध बिगुल बजाते हुए प्रतीत होते है।

एल.पी. तेस्सितोरी: इटली के प्रसिद्ध भाषा शास्त्री डाॅ. एल.पी. तेस्तितोरी 19141 में राजस्थान (बीकानेर) आए। बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने इन्हे राजस्थान के चारण साहित्य के सर्वेक्षण एवं संग्रह का कार्य सौंपा था जिसे पूर्ण कर इन्होने अपनी रिपोर्ट दी तथा राजस्थानी चारण साहित्यः एक ऐतिहासिक सर्वे तथा पश्चिमी राजस्थानी व्याकरण नामक पुस्तकें लिखी। बीकानेर इनकी कर्मस्थली रहा है। बीकानेर का प्रसिद्ध म्यूजियम इन्ही की देन है।

कर्नल जेम्स टॉड: इग्लैण्ड निवासी जेम्स टाॅड वर्ष 1917-18 में पश्चिमी राजपूत राज्यों का पाॅलिटिकल एजेंट बनकर उदयपुर आए। इन्होने 5 वर्ष तक राजस्थान की इतिहास विषयक सामग्री एकत्र की एवं इग्लैंड जाकर वर्ष 1829 में "एनल्स एंड एंटीक्विटीज आफ राजस्थान" नामक ग्रंथ लिखा जिसका दूसरा नाम सेंट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स आॅफ इंडिया है। इस रचना में सर्वप्रथम राजस्थान शब्द का प्रयोग हुआ। कर्नल जेम्स टॉड  को राजस्थान के इतिहास लेखन का पितामह माना जाता है।

बांकीदास ने अपनी कविताओं में अंग्रेजी की अधीनता स्वीकार करने वाले राजपूत शासकों को फटकारा था।

कन्हैयालाल सेठिया: चुरू जिले के सुजानगढ कस्बे में जन्मे सेठिया आधुनिक काल के प्रसिद्ध हिंदी व राजस्थानी लेखक है। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य रचना ‘पाथल व पीथल’ है। (पाथल राणाप्रताप को व पीथल पृथ्वीराज राठौड़ को कहा गया है) सेठिया की अन्य प्रसिद्ध रचनाएं - लीलटांस, मींझर व धरती धोरा री है।

विजयदान देथा: देखा की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कृति ‘बांता री फुलवारी’ है जिसमें राजस्थानी लोक कथाओं का संग्रह किया गया है। राजस्थानी लोकगीतों व कथाओं के शोध में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।

कोमल कोठारी: राजस्थानी लोकगीतों व कथाओं आदि के संकलन एवं शोध हेतु समर्पित कोमल कोठारी को राजस्थानी साहित्य में किए गए कार्य हेतु नेहरू फैलोशिप प्रदान की गई। कोमल कोठारी द्वारा राजस्थान की लोक कलाओं, लोक संगीत एवं वाद्यों के संरक्षण, लुप्त हो रही कलाओं की खोज एवं उन्नयन तथा लोक कलाकारों को प्रोत्साहित करने हेतु बोरूंदा में रूपायन संस्था की स्थापना की गई।

सीताराम लालस: सीताराम लालस राजस्थानी भाषा के आधुनिका काल के प्रसिद्ध विद्वान रहे है। राजस्थानी साहित्य में सीताराम लालस की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि राजस्थानी शब्दकोश का निर्माण है।

मणि मधुकर: मणि मधुकर की राजस्थानी भाषा की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति पगफेरो है।

रांगेय राघव: राजस्थान के रांगेय राघ देश के प्रसिद्ध गद्य लेखक रहे है। इनके प्रसिद्ध उपन्यास घरोंदे, मुर्दों का टीला, कब तक पुकारूं, आखिरी आवाज है।

यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’: राजस्थान के उपन्यासकारों में सर्वाधिक चर्चित उपन्यासकार बीकानेर के यादवेंद्र शर्मा चंद्र ने राजस्थान की सामंती पृष्ठभूमि पर अनेक सशक्त उपन्यास लिखे। उनके उपन्यास ‘खम्मा अन्नदाता’ ‘मिट्टी का कलंक’ ‘जनानी ड्योढी’ ‘एक और मुख्यमंत्री’ व ‘हजार घोड़ों का सवार’ आदि में सामंती प्रथा के पोषक राजाओं व जागीरदारों के अंतरंग के खोखलेपन, षडयंत्रों व कुंठाओं पर जमकर प्रहार किये गए है। 
राजस्थानी भाषा की पहली रंगीन फिल्म लाजराखो राणी सती की कथा चंद्र ने ही लिखी है। हिंदी भाषा में लिखने वाले राजस्थानी लेखकों में यादवेंद्रशर्मा चंद्र सबसे अग्रणी है।

चंद्रसिंह बिरकाली: ये आधुनिक राजस्थान के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रकृति प्रेमी कवि है। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रकृति परक रचनाएं लू, डाफर व बादली है। चंद्रसिं ह बिरकाली ने कालिदास के नाटकों का राजस्थानी में अनुवाद किया है।

मेघराज मुकुल सेनाणी व श्रीलाल जोशी की आभैपटकी राजस्थानी भाषा की लोकप्रिय रचनाएं रही है।


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Wednesday, 14 September 2011

राजस्थान मे प्रमुख इतिहासकार : डा. गोपीनाथ शर्मा

शारीरिक पुष्टता कम थी, प्रवास का कार्य कठिन था। कोई दूसरा विकल्प न होने के कारण गोपीनाथ को यह कार्य न चाहते हुए भी करना पड़ा। निरीक्षण का क्षेत्र विस्तृत था- भीलवाड़ा, चित्तौड़ व उदयपुर। इस प्रवास में उन्हें ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यहां के जनजीवन, यहां की प्रकृति, लोगों की आर्थिक स्थिति, तीज त्योहार, खेती आदि को नजदीक से उन्होंने देखा। अब उन्हें इनके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने की इच्छा हुई। जिस प्रवास पर प्रारम्भ में जाने से भय लगता था वह अब उनके जिज्ञासा का कारण बन गया। उनकी यह इच्छा तीव्रतर होती गई। बाद में उन्होंने यह निश्चय किया कि वे एम.ए. की परीक्षा इतिहास में देंगे। उस समय आगरा विश्वविद्यालय से स्वयंपाठी के रूप में परीक्षा देने की व्यवस्था थी। इतिहास की पुस्तकें उन्होंने “इम्पीरियल लाइब्रेरी कलकत्ता” के सदस्य बनकर प्राप्त कर लीं। ये पुस्तकें उन्हें एक माह के लिये ही मिलती थी। सन् 1937 में उन्होंने एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। दण्ड स्वरूप दी गई नियुक्ति गोपीनाथ के लिये वरदान सिद्ध हुई। एम.ए. करते ही उन्हें लम्बरदार हाई स्कूल, जो उस समय कृषि महाविद्यालय के पुराने भवन में था, के उप प्रधानाध्यापक पद पर नियुक्ति मिल गई। यहां उन्होंने दो वर्ष काम किया। उस समय मेवाड़ राज्य के शिक्षामंत्री रतिलाल अंतानी का पुत्र विनोद अंतानी एम.बी. कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रहा था। उसके विदेश चले जाने पर उस रिक्त पद पर 40 रू. मूल वेतन व 35 रू. भत्ते के मासिक वेतन पर उनकी एम.बी. कॉलेज में नियुक्ति हो गई।


उस समय एक रोचक घटना घटी । उत्तरप्रदेश के राज्यपाल की सिफारिश पर श्री चण्डीप्रसाद को इतिहास के प्राध्यापक के रूप में चयनित किया गया। परिणामस्वरूप गोपीनाथ को लिपिक का कार्य करना पड़ा। उन्हें केवल एक कालांश इतिहास पढ़ाने का अवसर मिलता था। समय बीता। निदेशक महोदय ने चण्डी प्रसाद से उनके प्रमाणपत्र मांगे। पहले तो उसने आनाकानी की, बाद में दबाव डालने पर उसने स्पष्ट बताया कि उसने इतिहास संबंधित कोई परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है। यह पूछे जाने पर कि “वह इतिहास का अध्यापन कैसे करता था” उसने बताया कि “वह गोपीनाथ से पढ़कर पढ़ाता था। वे यह जानते थे कि मेरे (चण्डीप्रसाद के) यहां रहने पर वे (गोपीनाथ) कभी प्राध्यापक नहीं बन सकते फिर भी उन्होंने मुझे पढ़ाया। वे भले और उदार प्राणी है और वे ही इस पद के लिये योग्य व्यक्ति है।” बाद में गोपीनाथ को प्राध्यापक के पद पर स्थायी तौर पर 100 रू. के मासिक वेतन पर नियुक्ति मिल गई।

एक बार एम.बी. कॉलेज में एक अंग्रेज निरीक्षक निरीक्षण करने आये। निरीक्षक जब गोपीनाथ जी के कक्ष में निरीक्षण करने आये तो वे नागरिक शात्र (उस समय नागरिक शात्र इतिहास का ही अंग माना जाता था।) में नागरिकों के मौलिक अधिकार पढ़ा रहे थे। वे 20 मिनट तक कक्षा में बैठे । निरीक्षण की समाप्ति पर मेवाड़ के शिक्षा मंत्री से भेंट के समय उन्होंने गोपीनाथजी के अध्यापन की तो प्रशंसा की पर इतिहास से नागरिक शात्र हटाने की बात कही। निरीक्षण के बाद गोपीनाथजी को बुलाया गया तो उनके मन में यह शंका रही कि उनके अध्यापन में कमी रह गई है। मिलने पर सारी बात जान लेने पर गोपीनाथ जी ने शिक्षा मंत्री को समझाया कि किसी विषय को हटाना या लगाना किसी प्राध्यापक का काम नहीं है यह तो बोर्ड ही कर सकता है। उनकी इस निर्भीकता से शिक्षा मंत्री बड़े प्रभावित हुए।
इतिहास में ख्याति बढ़ने के साथ ही राज्य सरकार ने उन्हें सन् 1944 में “मेवाड़ में ऐतिहासिक दस्तावेज की संभागीय समिति” के सचिव के पद पर नियुक्त किया। प्राध्यापक का कार्य करते हुए उन्होंने तीन वर्ष तक यह कार्य सम्भाला। समय की बचत करने के लिये इस समय गोपीनाथ जी ने साईकिल सीखी।

शिक्षा में प्रसार के कारण एम.बी. कॉलेज में छात्रों की संख्या बढ़ती जा रही थी। उचित अवसर जानकर राज्य सरकार ने इस कॉलेज को क्रमोन्नत कर दिया। इस डिग्री कॉलेज के प्रथम प्राचार्य बने डा. बसु, जो एक कुशल प्रशासक थे। उन्होंने आते ही अध्यापकों की योग्यता को देखकर छंटनी की। कॉलेज के लिये 7 प्राध्यापक ही अपनी योग्यता पूर्ण करते थे, उनको इस कॉलेज के अध्यापन के लिए रखकर बाकी को फतह हाई स्कूल भेज दिया। गोपीनाथ जी पूर्व की भांति इसी कॉलेज में रहे।
स्वतंत्रता प्राप्ति तक आते-आते गोपीनाथजी की ख्याति इतिहासविद के रूप में हो चुकी थी। उनकी इस विद्वत्ता के कारण राजस्थान विश्वविद्यालय ने इन्हें सन् 1954 में “बोर्ड ऑफ स्टडीज इन हिस्ट्री एण्ड आर्कोलोजी” में सदस्य नियुक्त किया , उनकी इस बोर्ड में 1955 तक सदस्यता रही। सन् 1951 तक वे इस बोर्ड के संयोजक रहे। इसके अतिरिक्त वे भाषा, सामाजिक ज्ञान, अनुवाद, कला संकाय तथा एकेडेमिक कांउंसिल के भी सदस्य रहे।
अध्यापन कार्य करते हुए उन्हें इतिहास में शोध करने की इच्छा हुई। आजीविका की दृष्टि से उन्हें अब कोई चिन्ता नहीं थी। डा. आशीर्वाद लाल श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में “मेवाड़ एण्ड मुगल एम्परर्स” विषय पर शोध प्रारम्भ किया । इसमें उन्होंने महाराणा सांगा से लेकर राजसिंह तक के इतिहास के उन पक्षों को विद्वानों के समक्ष लाकर रखा जो पहले कभी नहीं आये थे। सन् 1951 में उन्हें डाक्टरेट की उपाधि से विभूषित किया गया। शोध अमूल्य था अत: राजस्थान विश्वविद्यालय ने इसके प्रकाशन के लिये 1500 रू. का अनुदान देकर इसे प्रकाशित करवाया। पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् इस शोधग्रंथ की न केवल इतिहासविदों, समालोचकों और विद्वानों ने प्रशंसा की अपितु उस समय की पत्र-पत्रिकाओं ने भी इस ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

`मेवाड़ एण्ड मुगल एम्परर्स’ इस शोध ग्रंथ ने डा. गोपीनाथ शर्मा को इतिहास के क्षेत्र में प्रसिद्ध इतिहासकारों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। इसी प्रसिद्धि के कारण जोधपुर में इतिहास के अध्यक्ष श्री हेमराज जी के सेवानिवृत होने पर डा. गोपीनाथ शर्मा को पदोन्नत कर जोधपुर स्थानान्तारित किया गया। यह पदोन्नति प्रारंभ में अस्थायी तौर पर की गई। बाद में राजस्थान लोकसेवा आयोग के माध्यम से चयनित होकर स्थायी रूप से पोस्ट- ग्रेजुएट प्रोफेसर के रूप में आपने कार्य भार संभाला।
डूंगरपुर-बांसवाड़ा का प्रश्न :- सन् 1953-54 में भारत के राज्यों के पुनर्गठन के बारे में वार्ताएं चल रही थी। कौन सा भू भाग किस प्रदेश का अंग बने इसका मानचित्रों पर रेखांकन किया जा रहा था। गुजरात राज्य ने डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर जिले का दक्षिणी भाग, सिरोही, आबू तथा जालोर को अपने राज्य में मिलाने दावा प्रस्तुत किया। गुजरात राज्य ने इस कार्य को सम्पादित करने के लिए डा. मजूमदार जैसे इतिहासविद् को आमंत्रित करके उन्हें कार्य सौंपा। राजस्थान राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया जी की पैनी दृष्टि ने डा. गोपीनाथ जी की योग्यता को पहिचान लिया था अत: यह कार्य राज्य सरकार ने डा. शर्मा को दिया।

कार्य दुस्साध्य था पर असम्भव नहीं। चुनौती पूर्ण कार्य के लिए तो वे सदा तत्पर रहते थे। गुजरात ने यह लिखा था कि राजनैतिक दृष्टि से यह भाग राजस्थान पूर्व में अंग रहा हो पर सांस्कृतिक दृष्टि से यह भू भाग गुजरात का ही अंग होना चाहिये। इन क्षेत्रों के दस्तावेजों, शिलालेखों व अन्य स्रोतों की खोज के लिये इन्हें कई दिनों तक जोधपुर के बाहर रहना पड़ता था। पत्नी और बच्चों को अपने कार्य की सिद्धि के लिये कष्ट देना उन्हें अखरता था, पर आवश्यक होने के कारण यह उन्हें करना पड़ता था। अपनी पत्नी से इस कठिनाई के बारे में वे चर्चा करते तो उनकी पत्नी सान्त्वना भरे शब्दों में कहती- “आप जो भी करते हैं सोच समझ कर ही करते हैं। मुझ आप पर पूरा भरोसा है। मुझे आपके इस कार्य से किसी कठिनाई का अनुभव नहीं होता।” यहीं कारण था कि डा. शर्मा अपना कार्य समय पर पूर्ण करने में सफल हुए। उनके सद् प्रयत्नों से डूंगरपुर बांसवाड़ा आदि राजस्थान के ही अंग बने।

डा. शर्मा की कार्य कुशलता और लगन को देखकर पुनर्गठन का कार्य पूर्ण होते ही राजस्थान सरकार ने उन्हें “भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में राजस्थान का योगदान” के तथ्यों को संकलित करने के लिये अनुंसधान अधिकारी नियुक्त किया। यह भी मात्र तथ्यों को इकट्ठा करने का कार्य नहीं था। स्वतंत्रता के पूर्व विभिन्न रियासतों में आन्दोलन का स्वरूप एक सा नहीं था। कहीं कहीं आन्दोलन ने इसका उग्र रूप धारण कर लिया था। ऐसे विविधतापूर्ण आन्दोलन के विषय को व्यवस्थित व क्रमबद्ध करने का कार्य सरल नहीं था। पर डा. शर्मा ने अथक परिश्रम कर इस कार्य को भी समयावधि में पूर्ण कर दिखाया।

इस समय तक वे भारत के पुरातत्व व इतिहास के विभिन्न संस्थाओं के साथ जुड़ चुके थे। इन संस्थाओं में समय समय पर विभिन्न विषयों पर पत्र वाचन करने के लिये डा. शर्मा को बुलाया जाता रहा। पत्रवाचन, लेखन में उनका विषय मेवाड़ व इतिहास से सम्बन्धित ही रहते थे जिनका प्रकाशन पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर होता रहा। राजस्थान सरकार ने उनकी इस रूचि को देखते हुए उन्हें “उदयपुर संभाग के ऐतिहासिक सर्वेक्षण समिति” का सचिव बनाया। यह सर्वेक्षण का कार्य उनकी देखरेख में सन् 1956 तक पूर्ण कर लिया गया। उनके जीवन का हर पल, हर क्षण, हर लेख, हर वार्ता इतिहास के लिये ही थे। इतिहास के मूक शोधन के रूप में लग रहना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।

सन् 1954 में शंकर सहाय सक्सेना महाराणा भूपाल कालेज के प्राचार्य बनकर आये। आते ही उन्होंने राजनीति शात्र और इतिहास के विषय को अलग कर इसके दो विभाग बना दिये और इतिहास विभाग के रिक्त हुए पद पर डा. गोपीनाथ शर्मा को बुलवा लिया। डा. शर्मा जोधपुर से स्थानान्तरित होकर उदयपुर आ गये। उदयपुर के आवास के समय उन्होंने डी.िलट करने का निश्चय किया। “मध्ययुगीन राजस्थान का सामाजिक जीवन” यह उनके शोध का विषय था। सन् 1962 तक यह शोध ग्रंथ लिखकर तैयार हो गया। इस शोध कार्य के परीक्षक थे डा. आर.पी. त्रिपाठी जो उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। यह साक्षात्कार आगरा विश्वविद्यालय के सीनेट हाल में हुआ। उस समय साक्षात्कार खुला होता था कोई भी आकर प्रश्नोत्तर सुन सकता था। दर्शकों को प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। इस साक्षात्कार में डा. शर्मा के परम मित्र व्रजराज चौहान भी आगरा आये थे। साक्षात्कार सुरूचिपूर्ण और प्रभावी रहा। डा. शर्मा को डी.िलट की उपाधि प्रदान की गई। इस साक्षात्कार से चौहान साहब इतने प्रसन्न हुए कि उनको इस खुशी में उन्होंने वहीं `ताजमहल का संगमरमर का माडल’ स्मति चिन्ह के रूप में भेंट किया। कैसे थे वे मित्रता के मधुर क्षण।

डी.िलट की उपाधि ग्रहण करने पर राजस्थान विश्वविद्यालय ने डा. गोपीनाथ शर्मा को जयपुर में रीडर के पद के लिये चयनित किया। यहां उन्होंने राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस की स्थापना की जिसका प्रथम अधिवेशन जोधपुर में हुआ। इसमें इतिहासविद् डा. मथुरालाल शर्मा, डा. दशरथ शर्मा, उपकुलपति डा. पाण्डे, डा. खडगावत (पुरा लेखाधिकारी) तथा डा. गोपीनाथ शर्मा सम्मिलित हुए। इसमें डा. गोपीनाथ शर्मा को सचिव चुना गया जिसे उन्होंने चार वर्ष तक निभाया अजमेर के अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष चुना गया। इस प्रकार से उनके प्रयासों से यह इतिहास कांग्रेस फलने फूलने लगी।

रीडर के पद पर कार्य करते हुए लगा कि उनकी योग्यता के आधार पर उन्हें रीडर नहीं प्रोफेसर होना चाहिये अतः एक प्रार्थना पत्र उन्होंने उपकुलपति भटनागर के नाम लिखा। उपकुलपति भी उनके मत से सहमत थे अतः यह बात उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को लिखी। उन्होंने लिख भेजा कि किसी का किसी पद के लिये चयन `चयन प्रक्रिया’ के माध्यम से किया जाता है। उपकुलपति उन्हें प्रोफेसर देखना चाहते थे अतः उन्होंने उनसे उनकी सारी रचनाएं मांगी। उन रचनाओं को उन्होंने दो भारत के तथा एक विदेश के विशेषज्ञों को टिप्पणी के लिये लिख भेजा। तीनों विशेषज्ञों ने एक राय दी कि जिनकी भी ये रचनाएं हैं उन्हें तो पहले से ही प्रोफेसर हो जाना चाहिये था। इस आधार पर उपकुलपति ने उनको प्रोफेसर के पद पर नियुक्त कर दिया।

उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें 60 वर्ष में सेवानिवृत्त नहीं किया गया। उन्हें पहले तीन वर्ष के लिये और फिर दो वर्ष के लिये सेवा करने का अवसर प्रदान किया गया। ऐसाआदेश प्राप्त करने वाले ये प्रथम और अन्तिम व्यक्ति थे। 65 की अवस्था में जब वे सेवानिवृत्त होने लगे तो वि.िव. अनुदान आयोग ने इनकी योग्यता और अनुभव का शिक्षा जगत को लाभ देने के लिये एमरेटस प्रोफेसर के रूप में कार्य करने के आदेश दिये। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से 71 वर्ष तक अध्यापन से जुड़े रहे। बाद में विद्यालय ने इन्हें `राजस्थान स्टडी सेन्टर’ के मानद निदेशक के रूप में नियुक्त किया जिसे वे अन्तिम समय तक निभाते रहे। डा. मथुरालाल शर्मा के निधन के पश्चात इन्हें `इन्स्टीट्यूट आफ हिस्टोरीकल रिसर्च’ में भी निदेशक बनाया गया। इस प्रकार भारत की कई संस्थाओं के साथ डा. गोपीनाथ जुड़े थे और अन्तिम सांस तक अपनी सेवाएं देते रहे।

आपने इतिहास से सम्बधित 25 ग्रंथों की रचना की। महाराणा फतहसिंह के `बहिडे’ नामक पुस्तकों का सम्पादन किया, 100 से अधिक लेख भारत की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में छपे। लगभग 25 शोधकर्त्ता आपके मार्गदर्शन में `डाक्टरेट’ कर चुके है। विभिन्न विश्व विद्यालयों से सम्बन्धित शोध छात्र-छात्राएं भी आपसे मार्गदर्शन लेते रहे। संसार के बड़े-बड़े विद्वानों ने मेवाड़ के इतिहास, संस्कृति, सामाजिक जीवन, कला आदि का मार्गदर्शन प्राप्त किया। अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिये आपको कई संस्थाओं ने आपका सम्मान किया। इन्हें कुम्भा पुरस्कार, कविराज श्यामलदास पुरस्कार, नाहर सम्मान पुरस्कार आदि से सम्मानित किया गया। सन् 1982 में भारत सरकार के दिल्ली मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल, एन.सी.सी. द्वारा पदक प्रदान किया गया।


राजस्थान मे प्रमुख इतिहासकार : पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा


सन् 1918 के बाद राजनैतिक चेतना की नई लहर देश में उठी, उसने राष्ट्रीय पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जगाया। इस वर्ष इन्दौर में महात्मा गांधी के सभापतित्व में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ। सन् 1922 में नागरी प्रचारिणी पत्रिका का नवीन संस्करण प्रारम्भ हुआ जिसका सम्पादन ओझा जी व चन्द्रधर गुलेरी ने किया। उन दिनों भारत विषयक अध्ययन में एक मुख्य पत्र के रूप में इस पत्रिका ने दुनिया भर के विद्वानों का ध्यान अपनी ओर खींचा।ओझा जी आधी शताब्दी तक ज्ञान के प्रकाश स्तम्भ के रूप में खड़े थे। वे भारत के अतीत का मार्ग टटोलने में निरन्तर आलोक पाते रहे। सिरोही राज्य, सालंकियों तथा राजपूताने के इतिहास के साथ-साथ आपने इतिहास तथा अन्य विषयक कई ग्रंथ लिखे उनमें से उदयपुर राज्य का इतिहास प्रथम खण्ड (1928) द्वितीय खण्ड (1932), डूंगरपुर राज्य का इतिहास (सन् 1936), बांसवाड़ा राज्य का इतिहास (1936) बीकानेर राज्य का इतिहास प्रथम भाग (सन् 1937) द्वितीय भाग (सन् 1940), जोधपुर राज्य का इतिहास प्रथम भाग (1938) दूसरा भाग (1941), प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास (1940) तथा तीन निबन्ध संग्रह प्रकाशित हुए। इसके अतिरिक्त आपने पत्र पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया।ओझा जी के सम्पर्क में जो भी आया वह स्वयं प्रकाशित हो गया। उनके सम्पर्क से टोंक के मुंशी देवीप्रसाद, जोधपुर के रामकरण आसोपा, कविराज मुरारिदान, अजमेर के हरविलास सारड़ा, मेयो कोलेज के चन्द्रधर गुलेरी, जयपुर के पुरोहित हरिनारायण, जयपुर बीकानेर के रामलाल रत्म, मेवाड़ के मेहता जोधसिंह, रामनारायण दुग्गड़ और मुनि जिनविजय तथा कलकत्ते के पूरणचन्द नाहर आदि उनके मित्रों, सहयोगियों और शिष्यों की एक मण्डली खड़ी हो गई थी जिसने ओझा जी के साथ राजस्थान, गुजरात, सिंध, महाराष्ट्र, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड, बिहार, नेपाल तक के इतिहास व पुरातत्व के विवेचन संशोधन में बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया। स्वीमी श्रद्धानन्द के शिष्य जयचन्द्र विद्यालंकार ने भी 1922 ई. में अजमेर आकर शिष्यत्व ग्रहण किया। (हमारा राजस्थान पृ. 474)ओझा जी अपना काम सन् 1941 तक अनथक भाव से करते रहे। उनका आशीर्वाद व मार्गदर्शन इस बीच राजस्थान की हर सांस्कृतिक चेष्टा को प्राप्त होता रहा। उनका राजपूताने का इतिहास तब तक आधे रास्ते पर पहुंचा था। उनके और काशीप्रसाद जायसवाल के शिष्य जयचन्द्र विद्यालंकार ने इस बीच ‘भारतीय इतिहास परिचय’ नामक संस्था खड़ी की थी। उनका उद्देश्य भारतीय दृष्टि से समस्त अध्ययन को आयोजित करना और भारत की सभी भाषाओं में उसके द्वारा ऊं चे साहित्य का विकास करना था। (वही-पृ. 482)सन् 1941 में ओझा जी ने जयचन्द्र विद्यालंकार को अजमेर बुलाकर कहा कि उनके शोधकार्य का भार वे उठा लें। उसके लिये राजस्थान में भारतीय इतिहास परिषद की एक शाखा स्थापित कर दे। इस विचार का उत्साह से स्वागत किया गया। किन्तु इसके शीघ बाद जापान युद्ध और सन् 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन आ गया। इस राजनैतिक संघर्ष में जयचन्द्र जेल चले गये। सन् 1946 में जब वे जेल से छूट कर आये तब तक राष्ट्रीय शिक्षा और भारतीय इतिहास परिषद के आदर्श के लिये उत्साह ठण्डा पड़ चुका था। ओझा जी वृद्ध हो चुके थे। 20 अप्रेल 1947 को ओझा जी ने 84 वर्ष की आयु में अपनी जीवन लीला समाप्त की।ओझा जी ने इतिहास और हिन्दी के लिये अपना पूरा जीवन खपा दिया। वे सन् 1927 में भरतपुर अधिवेशन में तथा नडियाद में हुई गुजरात साहित्य सभा में सभापति मनोनीत किये गये। 1928 ई. में उन्होंने हिन्दुस्तानी एकडमी इलहाबाद में मध्यकालीन भारतीय संस्कृतियों पर तीन भाषण दिये। 1937 ई. में आप ओरियण्टल कांफ्रेंस बड़ौदा में इतिहास विभाग के अध्यक्ष बने। इसी वर्ष काशी हिन्दु विश्वविद्यालय ने आपके वृहत कार्य को देखते हुए डी.िलट उपाधि से विभूषित किया। इसी प्रकार 1937 ई. में साहित्य वाचस्पति और वचस्पति से विभूषित किया गया। (राजस्थान के इतिहासकार- पृ. 105)


डा. हुकमसिंह भाटी के शब्दों में ओझा ने राजपूताने के इतिहास के लेखन के लिये विस्तृत ठोसपूर्ण पीठिका बना कर एक अग्रदूत की भांति इतिहास का प्रणयन किया, कई प्रश्नों के उत्तर दिये, कई प्रसंग कायम किये। उन्होंने निरन्तर खोज व गंभीर अध्ययन केबाद राजनैतिक घटनावली की सुनिश्चित परम्परा कायम कर तत्कालीन आदर्शों के अनुसार इतिहास लेखन का प्रयास किया। कई अविदित तिथियों को उद्घाटित किया तथा अशुद्ध तिथियों का शुद्धीकरण किया। अनेक त्रुटित वंशावलियों को शुद्ध किया तथा अनेकानेक ऐतिहासिक लुप्त कड़ियों को जोड़ा। स्थानीय स्रोतों का फारसी आदि स्रोतों से सही तालमेल बैठा कर घटनाओं को परखने का सुयत्न किया। इस प्रकार राजस्थान के इतिहास सम्बन्धी वैज्ञानिक ढंग से अनुसंधान करने वाले वे एकमात्र विद्वान थे। नवीन अनुसंधान में निश्चय ही ओझा जी की यह शोध-साधना हमारा मार्ग प्रशस्त करती रहेगी और इसके लिये इतिहासकार व संशोधक सदैव उनके अनुगृहीत रहेंगे।

इस समय तक इतिहास के क्षेत्र में ओझाजी की पहचान भारतभर में हो चुकी थी। इसलिये इस क्षेत्र में उनकी सेवाएं भारत सरकार ने भी ली थी। टॉड़ की पुस्तक का प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद कराने का प्रयत्न इन्ही के माध्यम से किया गया था। उनकी दी हुई टिप्पणियों में बहुत सी नई और प्रामाणिक सामग्री सबसे पहले प्रकाश में आयी। क्रान्तिकारी केसरीसिंह बारहठ ने ओझाजी के सहयोग से कविराज सूर्यमल्ल मिश्रण के वहां भास्कर का संस्करण निकाला। उस समय ओझाजी ने भारतीय राजवंशों का विवरण देने वाली एक पुस्तिका निकाली जिसमें दक्षिण के प्रतापी राष्ट्रकूट सम्राटों का विवरण भी था। जोधपुर के कर्नल प्रताप तथा दूसरे राठौड सरदारों में अपना वंश गौरव जगाने और 1911-15 में क्रान्तिकारियों से मिल कर अपना राज्य स्थापित करने की महत्वाकांक्षा जगाने में ओझा जी के इस ग्रंथ का महत्त्वपूर्ण योगदानव था। इस ग्रंथ को ओझाजी ने जोधपुर महाराव के आग्रह पर वहां जाकर सुनाया जिसकी एक प्रति वहीं रखी गई। बाद में पं. सुखदेव प्रसाद ने इसी ग्रंथ के आधार पर अंग्रेजी भाषा में राठौड़ों का इतिहास लिखा । (हमारा राजस्थान-पृथ्वीसिह मेहता – पृ. 471)

ओझाजी इतिहास लेखन और अभिलेखों के संग्रह में इतने जुट गये कि उन्हें बाहरी संसार का भान नहीं रहा। एक के बाद एक वंश का इतिहास लेखन समाज के समक्ष आने लगा। सन 1907 में सोलंकियों का इतिहास लिखकर प्रकाशित किया। इसमें भारत के मध्यकालीन राजवंश का इतिहास पहले पहल प्रकाश में आया। अपनी मातृभूमि सिरोही राज्य के इतिहास द्वारा दक्षिणी पश्चिमी और उत्तरी गुजरात के इतिहास पर बहुत प्रकाश पड़ा। (वहीं पृ 471)।सन् 1908 में पुरातत्व के विभाग को सम्भालने के साथ उनका अध्ययन व्यापक होता गया। राजपुताना पुरातत्व संग्रहालय’ के विभाग में लगभग 30 वर्ष तक आपने सेवा की और उत्तर भारत के अभिलेखों का संग्रह किया। आज उत्तर भारत का जो अभिलेखों का संग्रह उपलब्ध है उसका एक तिहाई संग्रह अकेले ओझा जी के यत्न से किया गया था। (वही 472)सन् 1912-13 में बिहार में काशीप्रसाद जायसवाल के प्राचीन भारतीय राज संस्था व कानून पर मौलिक लेख निकले थे। ओझाजी की तरह ही उनका भी राष्ट्रीय चिन्तन था जो मौलिक व स्वतंत्र था। इस चिन्तन की पृष्ठभूमि में जिन युगपुरूषों की प्रेरणा उसे मिली थी उनमें प्रमुख थे-( वीर सावरकर, लाला हरदयाल व श्यामजी कृष्ण वर्मा) (वही पृ. 473) सन् 1914 में ओझाजी को रायबहादुर का खिताब मिला।लगभग 28 वर्ष के गहन अध्ययन के पश्चात् ओझा जी के सन 1925 में लिधा राजपूताने का इतिहास का पहला गुच्छक प्रकाश में आया। पहला गुव्छक निकलने पर हॉलैण्ड के लाईदन शहर से निकलने वाले भारतीय पुरातत्व के वार्षिक ग्रंथ निर्देश में उसका स्वागत उसके सम्पादक आलन्देज ने विद्वान डा. फोरनल के साथ बडे आदर से लिखकर किया। “यह राजपूताना का दूसरा कीर्ति स्तम्भ खड़ा हो रहा है।”इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण सन 1937 में निकला। इसकी विषद भूमिका में ओझा जी ने इतिहास का महत्त्व और उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए राजपुताना के इतिहास विषयक प्रकाशित पुस्तकों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों, हस्तलिखित ग्रंथों का विवेचन किया है। इसमें पहले राजपूताने की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानकारी दी है। उसके पश्चात विसेंट स्मिथ और विदेशी विद्वानों की राजपूतों की उत्त्पत्ति के बारे में जो सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि राजपूत शक, कुषाण, हूण, गोड, भड़ व गुर्जर जातियों से उत्पन्न हुए है इस निर्मूल कल्पना की जांच पड़ताल की तथा इसका खण्डन किया। इसी प्रकार चौहान, सोलंकी, प्रतिहार और परमार वंशियों को अग्निवंशी मानकर सिद्ध करने की कोशिश की। ओझा जी ने इस मत का भी खण्डन किया। (राजस्थान के इतिहासकार – पृ.109)


प्राचीन राजपूतों के रीति- रिवाज, उनका सैन्य प्रबन्ध, राज्य व्यवस्था, आदि सामाजिक व प्रशासनिक पहलुओं को ओझाजी ने उजागर करने का प्रयास किया है। राजपूताने से सम्बन्ध रखने वाले प्राचीन राजवंशों में मौर्य क्षत्रप (शक), कुषाण, हूण, गुप्त, गुर्जर, वैस, चावड़ा, प्रतिहार, परमार, नाग, तंवर, दहिया, दाहिमा, निकुम्प, डोडिया और गौड आदि वंशों का ताम्रपत्रों व शिलालेखों के आधार पर आपने प्रामाणिक विवरण दिया है। तत्पश्चात मुसलमानों, मराठों और अंग्रेजों का राजपूताने से सम्बन्ध के बारे में जानकारी दी है जो कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक के परिशिष्ट में क्षत्रियों के गोत्र तथा इसके नामान्त में सिंह पद का प्रचार कैसे हुआ इस विषय पर भी ओझा जी ने अपने विचार प्रकट किये हैं।

मेवाड़ और सिरोही राज्य की सीमा पर एक गांव है रोहिड़ा। अरावली श्रृंखला के पश्चिम में तलहटी में बसा यह गांव उस दिन धन्य हो गया जिस दिन हीराचन्द ओझा के घर पुत्र रत्न ने पदार्पण किया, वह दिन था मंगलवार भाद्रपद सुदि पंचमी सं. 1920 तदनुसार 15 सितम्बर 1863 ई.। अति सामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण प्रारम्भिक शिक्षा उस छोटे से गांव में ही हुई। संस्कृत भाषा का अध्ययन गौरीशंकर ने अपने पिता के पास रहकर किया। बाद में 1877 में मात्र 14 वर्ष की आयु में उच्च शिक्षा के लिये वे मुम्बई गये जहां 1885 में एलफिंस्टन हाईस्कूल से मेट्रिक्यूलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण की। रोगग्रस्त हो जाने के कारण वे इन्टरमीडियेट की परीक्षा न दे सके और गांव लौट आये। (राजस्थान के इतिहासकार – सं. 31.  डा. हुकमसिंह भाटी पृ. 104)

रोहिड़ा आने पर उन्हें राजपूताने के इतिहास के बारे में जानने की इच्छा हुई इस संदर्भ में उन्होंने “टॉड” की पुस्तक का अध्ययन किया। इस ग्रंथ ने उन्हें बहुत प्रेरणा दी। वे सच्चे ब्राह्मण की तरह अपने देश और मातृभूमि के अध्ययन के लिये प्रवृत्त हुए। आर्थिक और सामाजिक प्रलोभनों से आंखें मूंदकर अपनी पत्नी को साथ लेकर सिरोही से गोगुन्दा के रास्ते पैदल चलते हुए मेवाड़ के अनेक छिपे हुए और अप्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों को खोज खोज कर उनकी तीर्थ यात्रा करते हुए 1888 में उदयपुर पहुंचे। (हमारा राजस्थान-पृथ्वीसिंह मेहता पृ. 262)

उदयपुर में आपका सम्पर्क कविराजा श्यामलदास से आया। उनकी पैनी दृष्टि ने ओझा की प्रतिभा को तुरंत पहचान लिया। उनकी विद्वत्ता से वे प्रभावित भी हुए। कविराजा के आग्रह पर ही महाराणा फतहसिंह ने उसे इतिहास विभाग में रख दिया। उस समय तक “वीर विनोद” के लेखन का कार्य लगभग समाप्त हो चुका था। अतः ओझाजी को विक्टोरिया हाल के सार्वजनिक पुस्तकालय व संग्रहालय का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्हें हिन्दी में लेखन कार्य करने की प्रेरणा “िवनायक शात्री बेताल” से मिली। इसी काल में ओझा जी ने भारतीय लिपियों का गहनता से अध्ययन किया। यूरोपीय विद्वान वुर्हलर की लिपि संबंधित पुस्तक का भी अध्ययन किया। ओझा जी से पूर्व भारतीय लिपि के बारे में यह धारणा थी कि भारतीय लिपि का विकास मिश्रा, हिब्रू के मिश्रण से हुआ है और वह भी ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में। (हमारा राजस्थान-पृ. 262-63)

सन् 1894 ई. में “भारतीय प्राचीन लिपि माला” नामक पुस्तक लिखकर भाषा और लिपि के क्षेत्र में क्रान्ति ला दी। उन्होंने बुइलर को पत्र लिखकर अपने तर्कों और प्रमाणों के आधार पर उनके द्वारा स्थापित विचार को निर्मूल सिद्ध किया। तब से दुनिया ने उनके सिद्धान्त को प्रतिष्ठा प्रदान की। आज यह पुस्तक सं.रा. संघ के उन पुस्तकों में है जो विश्व की निधि घोषित किये गये हैं। (वही पृ. 263)।इस पुस्तक के माध्यम से ओझा जी ने संसार के समक्ष यह विचार रखा कि ब्राह्मी लिपि समझने के पश्चात् दूसरी लिपियों को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि दूसरी लिपियों में थोड़ा बहुत अन्तर पड़ता जाता है। ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति पर भी आपने इस पुस्तक में प्रकाश डाला है। बाद में शिलालेखों, ताम्रपत्रों, सिक्कों व दानपत्रों पर उत्कीर्ण ब्राह्मी, गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा, बंगला, पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलगू, कन्नड़ी, कलिंग, तमिल, खरोष्ठी आदि लिपियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। इसके लिये ओझाजी ने विविध 45 लिपिपत्र तैयार कर अलग अलग भाषाओं में अक्षरों का बोध कराया। उसके पश्चात भारतवर्ष की लिपियों और अंकों की उत्पत्ति के बारे में उल्लेखनीय जानकारी दी। ( राजस्थान के इतिहासकार-पृ. 107)

सन् 1894 के बाद ओझाजी राजस्थान के इतिहास के मनन, पुनः शोधन व संकलन में लग गये। उनके अध्ययन की गंभीरता को पहचानते हुए विद्या विशारद जर्मन विद्वान कील हार्न ने सच ही लिखा था कि `ओझा से अधिक अपने देश के इतिहास को कौन जानता है।’ सन 1902 में लार्ड कर्जन दिल्ली दरबार में उपस्थित रहने के लिये महाराणा फतहसिंह को स्वयं निमंत्रण देने आये। रेजीडेण्ट के माध्यम से भारत सरकार को यह सूचना मिली थी कि महाराणा 1903 के दिल्ली दरबार में नहीं आयेंगे। इसलिये आग्रह करने स्वयं वायसराय उदयपुर आये थे। वहीं उनका परिचय ओझा जी से आया। उनकी विद्वत्ता और लगन से वे बड़े प्रभावित हुए। भारत के बारे में विशेष जानकारी के लिये उत्तर भारत का केन्द्र वे अजमेर को बनाना चाहते थे। ओझाजी से मिल कर उन्हें लगा कि पुरातात्विक कार्य के लिये यही व्यक्ति उपयुक्त हैं अतः उन्होंने ओझा जी के सम्मुख भारत के पुरातत्व के उच्च पद का प्रस्ताव रखा। पर उन्होंने इस पद को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वे मेवाड़ में रहकर ही उसकी सेवा करना चाहते थे।


कुछ वर्ष पश्चात सन 1908 में लार्ड मिण्टो ने लार्ड कर्जन की योजना अनुसार `राजपूताना पुरातत्व संग्रहालय’ की स्थापना अजमेर में की। इसके पालक के रूप में ओझाजी को बुलावा आया। वे मेवाड़ नहीं छोड़ते पर विद्वत सम्मान के प्रति महाराणा फतहसिंह की उदासीनता के कारण सन 1908 में वे उदयपुर छोड़कर अजमेर आ गये।

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